( विकास पाण्डेय की कलम से)
बिजुरी- आगामी 30 अप्रैल को बिजुरी मे होगा व्यापक जनांदोलन ,लोगो की लाइफ लाइन ट्रेनो को पटरी पर रिस्टोर करने के मद्देनजर होगा व्यापक जनांदोलन रैली आम सभा और बाजार बंद करके समस्त क्षेत्र वासी रेल प्रबंधन से सभी ट्रेनो को पटरी पर चलाने की करेंगे मांग सम्मानीय जनो द्वारा संबंधितों को दी गई इस आशय की सूचना लोगो के उत्साह और समर्थन पर जा टीकी आन्दोलन की मोटी लकीर सवाल जीवन दाइनी ट्रेनो का है और मौजूदा वक्त पर अधिकांश ट्रेने वेपटरी है फिर मतलब साफ है जनांदोलन की आवश्यकता क्यो पड़ी और जनांदोलन के भीतर से आखिर कौन सी अनुगूंज सुनाई देती है ! इसे समझने की कोशिश की जिए और सिलसिलेवार तरीके से उस अनुगूँज को अपने जहन मे रेल यात्राओ से जोड़ते चले जाइए तस्वीर स्पष्ट होगी धुंध छटेगी और यात्राओ के दौरान होने वाली परेशानियो की स्पष्ट तस्वीर आपके जहन मे रेंगने लगेगी , स्मरणीय है ट्रेनो को तो जीवन दाइनी का दर्जा दिया गया है लेकिन जीवन दाइनी ट्रेने बंद है और आम नागरिक समाज परेशान है एक ऐसी मोटी लकीर रेल प्रबंधन द्वारा खीच दी गई है एक दलील के आसरे जो दलील यकीन जानिए समझ से परे है रेल प्रबंधन उक्त रेलखंडो के बीच ट्रेनो को बंद करने के इर्द-गिर्द दलील तो यही दे रहा की ट्रैक पर काम चल रहा है इसलिए कोचिंग ट्रेनो को बंद कर दिया गया है लेकिन इसके ठीक पैरलर उक्त रेलखंडो के किसी भी स्टेशन पर खड़े हो जाइए और मालगाड़ियो की आवाजाही के आसरे सोचना शुरू कीजिए फिर ये सवाल आपके जहन मे भी तुरंत तैरने लगेगा अगर रेल पटरियो पर काम चल रहा है तो फिर उक्त मालगाड़ियो का परिचालन कैसे संभव हो पा रहा है ? क्या उक्त पटरियो के आसरे एक दो कोचिंग ट्रेनो को भी नही चलाया जा सकता या फिर की अब उक्त रेलखंडो के बीच रेल प्रबंधन की प्राथमिकता मे कोयले का परिवहन मात्र है! ये वो सवाल है जब आप उक्त रेलखंडो के बीच बने कीसी भी स्टेशन पर पैनी नजर डालेंगे तो तुरंत आपके जहन मे रेगने लगेगा क्योंकि मालगाड़ियो का परिचालन जारी है स्टेशनो पर तस्वीरे तो यही बताती है बिजुरी से होकर लगभग 18 मालगाड़ियो के रैक प्रतिदिन पटरियो पर दौड रहे है फिर कोचिंग ट्रेनो के परिचालन पर पाबंदी क्यो ! इस सवाल पर गंभीर होकर सोचने की आवश्यकता है यही इस जनांदोलन के अक्स तले सबसे बड़ा सवाल है अलबत्ता सर्वसम्मति, एकता और लोकतांत्रिक तरीके से इस जनांदोलन की बिसात बिछाई जानी चाहिए इस जनांदोलन के तलहटी तले सवाल सियासत का नही, सवाल जीवन दाइनी ट्रेनो का है फिर मतलब और मायने निकाल लीजिए स्वतंत्रता के साथ व्याख्या, चिन्तन, मनन और मंथन कर लीजिए और उसके भीतर से आने वाली गूंज को सुनिए और सियासत से दूर अपने मानस पटल पर विचार कीजिए ! वाकई वक्त कठिन है और यही मौजूदा वक्त का अनूठा सच भी है इस बात का उल्लेख इसलिए क्योंकि आप बीते लगभग 5 पूर्व के दौर मे लौट चलिए रेल संघर्ष समिति द्वारा सिलसिलेवार तरीके किए जा रहे प्रयासो को याद करिए ज्ञापनो के आसरे मोटी हो गई फाइल के पन्ने दर पन्ने पलटिए या फिर पुराने समाचार पत्रो के पन्नो पर नजर डालिए उक्त संघर्ष समिति की टीम द्वारा कोशिश तो यही की जा रही थी आवाज तो इसी बात की उठाई जा रही थी अपने प्रयासो के तले संघर्ष तो यही किया जा रहा था कि अंबिकापुर अनूपपुर रेल खंड के बीच नयी ट्रेनो की सौगात मिल सके स्वास्थ्य सुविधाओ के मद्देनजर शहडोल संभाग से सीधी नागपुर कनेक्टिविटी ट्रेन के पैरलर देश की राजधानी लुटियंश की दिल्ली व्हाया इलाहाबाद नयी ट्रेन का परिचालन प्रारंभ हो सके लेकिन यकीनन किसे मालूम था कि ऐसा वक्त आएगा की कनेक्टिविटी ट्रेन और नयी ट्रेन तो सौगात तो दूर की गोटी साबित होगी बल्कि एक दलील तले उक्त रेल खंडो मे अधोसंरचना का हवाला देकर कमोबेश ट्रेनो को बेपटरी कर दिया जाएगा और आम नागरिक समाज को उक्त ट्रेनो के परिचालन के लिए सड़क पर उतरकर आन्दोलन का रूख अख्तियार करने को मजबूर होना पड़ेगा इस मुहिम के आसपास अगर सियासत की नब्ज को टटोला जाए या फिर सासंद शहडोल हिमाद्री सिंह के दिल्ली के सत्ता के गलियारे मे किए गए प्रयासो को याद किया जाए तो तस्वीरो तले दिखाई तो यही देता है कि माननीय महौदया ने हर संभव कोशिश की है उस वक्त के पूर्व माननीय रेल मंत्री पियूष गोयल से लेकर माननीय मौजूदा रेल मंत्री अश्वनी बैष्नव से मुलाकात की इस आशय का माग पत्र भी सौंपा जनता की भावनाओ से अवगत भी कराया इतना ही नही लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर लोकसभा मे सत्ता का ध्यान भी इस ओर आकृष्ट कराया लेकिन परिणाम सिफर ही रहा आस्वाशन से इतर कुछ मिला नही सासंद महौदया के प्रयासो के इर्द-गिर्द हमारे जहन मे एक बड़ा सवाल घुमणता है आप सभी के दिमाग मे भी उक्त सवाल उठना चाहिए ये कौन सी स्थिति है ! क्या सत्ता के गलियारे मे भी सत्ता दल की सासंद की भी सुनने वाला कोई नही ! ये कौन जानता था ? और किसे मालूम था! कि बेपटरी हुई ट्रेनो को पटरी पर लाने के लिए मजबूरन आम नागरिक समाज को आन्दोलन का रूख अख्तियार करना पड़ेगा!
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